बेसहारा महिलाओं के लिए रहनुमा बन रही हिमाचल की बेटी

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( जितेन ठाकुर )
आधुनिकता और जिंदगी की भागम-भाग में जहां हर कोई एक दूसरे को पीछे छोड़ने को उतारू है, वहीँ किसी के पास इतना समय नहीं की जिस रास्ते से बह गुजरे ,उसमें क्या सही मिला और क्या गलत,इसके पहचान भर भी कर सके । भव्य ,विशाल और आधुनिक कहे जाने बाले हमारे बड़े बड़े कंक्रीट के शहरों में आधुनिकता तो बढ़ती जा रही है लेकिन इन्शानियत कहीं न कहीं मृत शैया पर आखिरी साँसें गईं रही है । हालांकि गावों में अभी भी लोगों के अंदर एक दूसरे की मदद करने का जुनून बाकी है,जिसे प्रेम और भाईचारा कहते हैं । इसी भागदौड़ के बीच हिमाचल की एक बेटी ने फिर से इन्शानियत की जो मिशाल कायम की है वह काबिले तारीफ है । जिला कांगड़ा के शाहपुर की डिम्पल जसवाल ने बेडा उठाया है उन बेसहारा महिलाओं को सहारा देने का ,जो समाज में अपने जीने की आस छोड़ सी चुकी हों । हालांकि डिम्पल को सरकार की तरफ से कोई कोई सहायता प्राप्त नहीं है ,लेकिन अपने दम पर ही उन्होंने , महिलाओं की मदद करने का जो बेड़ा उठाया है उसे जूनून ही कहा जा सकता है ।

हम दूसरों की मदद क्यों करते हैं..? क्या इसमें हमारा कोई स्वार्थ छिपा होता है, शायद नहीं… क्योंकि राह में चलते हुए किसी अनजान की मदद जब हम करते हैं तो उसमें हमारा क्या स्वार्थ हो सकता है । क्योंकि उसे तो हम जानते भी नहीं, वह उन लोगों में से हो सकता है, जिसे हमने शायद पहली बार देखा हो..। ऐसा हमारे साथ कई बार होता है कि किसी सड़क के किनारे जब हम किसी बुज़ुर्ग को देखते हैं, तो सड़क पार करने में उसकी मदद के लिए स्वयं ही आगे बढ़ते हैं । इतना ही नहीं, मदद करने के बाद हमें उनसे किसी प्रकार की कोई अपेक्षा भी नहीं होती । और हो भी क्यों… वह हमारे रिश्तेदार नहीं हैं, हम तो केवल इंसानियत के तौर पर उनकी मदद करते हैं । हालांकि एक महिला के लिए यह सब करना कितना मुश्किल हो सकता है यह तो एक महिला ही सही मायने में जान सकती है मगर तमाम वधाओं से टकराते हुए डिम्पल ने अपने लिए रास्ता तैयार किया है

पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन की एक शोधकर्ता क्रिस्टीना मार्कवेज के अनुसार हम किसी वृद्ध को सड़क पार कराने के लिए कभी संकोच नहीं करते । इसी को सामाजिक व्यवहार कहा जाता है । हमारे इसी सामाजिक व्यवहार को गहराई से समझने के लिए मार्कवेज ने एक अध्ययन किया है । इस शोध के अंतर्गत मार्कवेज द्वारा प्रयोगशाला में चूहों पर शोध किया गया । इसके लिए चूहों के लिए विभिन्न परिस्थितियों का प्रबंध किया गया ताकि शोधकर्ता यह जान सकें कि भिन्न-भिन्न परिस्थिति में एक जानवर कैसे रिएक्ट करता है । रिपोर्ट के मुताबिक, शोध के दौरान चूहों की जोड़ी को अलग-अलग भूमिका प्रदान की गई । इसमें एक को मदद करने वाले जबकि दूसरे को उसके साझीदार के तौर पर भूमिका दी गई । मदद करने वाला चूहा विकल्प तलाशने के लिए स्वतंत्र था ।

मार्कवेज ने बताया कि प्रयोग के तौर पर एक विकल्प में एक चूहे के लिए दरवाजा खुला हुआ था जहां खाने का इनाम खुद को ही दिया जाना था । वहीं, दूसरे विकल्प के तौर पर दूसरा दरवाजा खुला हुआ था, जहां दोनों चूहों के लिए भोजन रखे थे । आपको यह जानकर हैरानी होगी लेकिन शोध के अंत में पाया गया कि ज्यादातर चूहे दूसरे वाले विकल्प की ओर आकर्षित हुए। जबकि पहले वाले विकल्प के लिए 15 में से केवल एक चूहे ने पहल की। तो इसका मतलब है कि चूहे भी मनुष्य के उच्च सिद्धांत का पालन करते हैं, या मनुष्य चूहों के साथ कुछ बुनियादी सामाजिक सिद्धांत साझा करते हैं । इससे साफ ज़ाहिर होता है कि ना चाहते हुए भी हमारे अंदर ऐसे गुण बन जाते हैं जब हम किसी की मदद करने के लिए इच्छुक हो जाते हैं । या फिर हमारा समाज ही ऐसा है कि हम मिल-बांटकर कार्य करने के लिए बाध्य हैं, ना कि अकेले ही जीवन जीने के लिए बने हैं ।

हालांकि मानव जीवन का उद्देश्य है कि अपने मन, वचन और काया से औरों की मदद करना । हमेशा यह देखा गया है कि जो लोग दूसरों की मदद करते हैं, उन्हें कम तनाव रहता है, मानसिक शांति और आनंद का अनुभव होता है । वे अपनी आत्मा से ज़्यादा जुड़े हुए महसूस करते हैं, और उनका जीवन संतोषपूर्ण होता है । जबकि स्पर्धा से खुद को और दूसरों को तनाव रहता है । शहरों में लोग प्रतिस्पर्धा की लगातार दौड़ में हैं, और लगातार तनाव में भी रहते हैं, जबकि गावों में लोग सहज सा मह्शूश करते हैं । इसके पीछे गुह्य विज्ञान यह है कि जब कोई अपना मन, वचन और काया को दूसरों की सेवा के लिए उपयोग करता है, तब उसे सबकुछ मिल जाता है । उसे सांसारिक सुख-सुविधा की कमी कभी नहीं होती । धर्म की शुरूआत ओब्लाइजिंग नेचर से होती है । जब आप दूसरों के लिए कुछ करते हैं, उसी पल खुशी की शुरुआत हो जाती हैं ।

डिम्पल की मानें तो मानव जीवन का उद्देश्य जन्मों-जन्म के कर्म बंधन को तोड़ना और संपूर्ण मुक्ति को प्राप्त करना है । इसका उद्देश्य केवळ ज्ञान प्राप्त करने के लिए पहले आत्मज्ञान की प्राप्ति करना आवश्यक है । और यदि किसीको आत्मज्ञान प्राप्त करने का अवसर नहीं मिलता तो उसे परोपकार में जीवन व्यतीत करना चाहिए । डिम्पल का कहना है कि यह जिंदगी यदि परोपकार के लिए जाएगी तो आपको कोई भी कमी नहीं रहेगी। किसी तरह की आपको अड़चन नहीं आएगी । आपकी जो-जो इच्छाएँ हैं, वे सभी पूरी होगी और ऐसे उछल-कूद करोगे, तो एक भी इच्छा पूरी नहीं होगी । क्योंकि वह रीति, आपको नींद ही नहीं आने देगी । उन्होंने बड़ी सादगी से बताया कि मानव कौन कहलाए..? वही जो भाव से व्यवहार करे । सुख दिया हो, उसे सुख दे, मगर दुःख दिया हो, उसे दुःख न दे । ऐसा सब व्यवहार करे, वह मानवता कहलाती है । इसीलिए जो सामनेवाले का सुख ले लेता है, वह पाशवता में जाता है । जो खुद सुख देता है और सुख लेता है, ऐसा मानवीय व्यवहार करता है, वह मनुष्य पद में रहता है और जो खुद का सुख दूसरों को भोगने के लिए दे देता है, वह देवगति में जाता है, सही मायने में मानव है । खुद का सुख दूसरों को दे दे, किसी दुखी को, वह देवगति में जाता है ।

हालांकि हिमाचल में लोग एक दूसरे की मदद करने से पीछे नहीं हटते, मगर बेसहारा लोगों का सहारा बनने की हिम्मत भी किसी किसी के पास ही होती है । डिम्पल ने बिना किसी सहायता से एक समूह बनाया और निकल पड़ी उन औरतों के लिए मसीहा बनकर , जिन्हे समाज ने दरकिनार कर दिया या जिन्हे समाज में सहारा नहीं मिल पा रहा हो । हालांकि कई सामाजिक संगठनों ने डिम्पल के इस शराहनीय कदम के लिए उन्हें सम्मानित भी किया है । लेकिन इन बढ़ते क़दमों को उम्मीद है उस दिन की जब सरकार भी उनके कदम से कदम मिलाएगी और तब इनकी मुहीम सही मायने में साकार होगी ।


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