कुछ कर गुजरने की चाह ने दिखा दिया जमाने को रास्ता

हिमाचल प्रदेश के जितेन ठाकुर और उत्तराखंड की दिव्या रावत ने कुछ ऐसा कर दिखाया कि वरवस ही तारीफ के अक्षर फुट पड़ते हैं । हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के जितेन ठाकुर ने अपनी निजी भूमि पर चन्दन का विशाल वन लगा कर युवाओं को आमदनी का बेहतर बिकल्प दिया है , तो उत्तराखंड के चमोली गढभाल की दिव्या रावत ने कीड़ाजड़ी उगाकर पहाड़ी युवा पीढ़ी के लिए रोजगार का नया रास्ता दिखाया है । चन्दन और कीड़ाजड़ी दोनी ही बेहद महंगे बिकते हैं ऐसे में यह रोजगार का एक बेहद बेहतरीन बिकल्प है ।

कैसे बिखेरी चन्दन की खुशबू ..?
पहले बात करते हैं जितेन ठाकुर की । जितेन बिलासपुर जिले के घुमारवीं की पटेर पंचायत से हैं , इन्होने अपनी निजी भूमि पर सफ़ेद चन्दन का विशाल जंगल उगा लिया है । सैंकड़ों सफेद चंदन के पेड़ तैयार कर क्षेत्र के युवाओं को अपनी जमीन से बेहतर आय लेने का बेहतरीन रास्ता दिखाया है। हालाँकि जितेन ठाकुर ने चंदन के साथ साथ कई दूसरे पौधे जैसे दालचीनी, खुमानी, हरड़ और बहेड़ा भी उगाया है। जितेन का कहना है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा जो स्कीमें दी जाती हैं, वह अपने चहेतों को ही दी जाती हैं ऐसे में अन्य लोगों को कागजों की पेचीदगियों में हीं फंसा दिया जाता है और तब तक मानसून का मौसम निकल जाता है। ऐसे में उन्होंने बिना सरकारी सहायता के ही निचले हिमाचल के लोगों को आय का बेहतर रास्ता दिखाया है। सफेद चंदन का पेड़ 12 से 15 वर्षों में वयस्क हो जाता है। एक वयस्क पेड़ में लगभग डेढ से दो किवंटल रस्दार लकड़ी (Hart wood) निकल जाती है। जो 10 से 15 हजार रुपए प्रति किलो बिकती है।

चंदन लगाने के बाद 5वें साल से लकड़ी रसदार बनना शुरू हो जाती है। 12 से 15 साल के बीच यह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। कॉस्मेटिक में इसके तेल का प्रयोग किया जाता है, जिसके चलते चंदन की बहुत मांग रहती है। इसके एक वयस्क पेड़ से लगभग 2 से अढाई लीटर तेल निकलता है जिसकी कीमत 13 से 15 लाख प्रति लीटर है। चंदन के पेड़ की जड़ से सुगंधित प्रोडक्ट्स बनते हैं। इसलिए पेड़ को काटने के बजाए जड़ से ही उखाड़ा जाता है। उखाड़ने के बाद इसे टुकड़ों में काटा जाता है। ऐसा करके रसदार लकड़ी को कर लिया जाता है। एवरेज कंडीशन में एक चंदन के पेड़ से करीब 100 से 125 किलो तक अच्छी लकड़ी निकल जाती है। इस हिसाब से हर पेड़ लाखों का होता है। चंदन का पेड़ पांच डिग्री सेल्सियस से पचास डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में तैयार होता है। ऐसे में गुजरात की तरह हिमाचल की मिट्टी और मौसम भी चंदन के लिए अनुकूल पाए गए हैं। हिमाचल प्रदेश में अभी तक इसे इतनी बड़ी संख्या में उगाने का यह बड़ा मामला है

जितेन ठाकुर के प्रयास को देखकर बाकी लोगों को भी प्रेरणा मिलने लगी है. लोग अब उन क्षेत्रों में कमाई बाले पौधे रोंपने लगे हैं जहां फसल को जानवर उजाड़ देते हैं। धीरे-धीरे यह प्रयास गति पकड़ रहा है. लोग औषधीय और अन्य प्रकार के फलदार पौधे भी उगाने लगे हैं। ऊपरी हिमाचल में जहां सेब , पलम और नाख जैसे पौधे अच्छा मुनाफा देते हैं, वहीं निचले हिमाचल में चंदन उगाना बेहतरीन विकल्प है। जितेन ठाकुर के इस प्रयास से घुमारवीं की पटेर पंचायत, विश्व मानचित्र पर जगह बनाने की राह पर है।चंदन की खेती के लिये भी पेड़ों का इंश्योरेंस कराया जा सकता है क्योंकि इन पेड़ों के चोरी होना का खतरा ज्यादा रहता है। यदि इंश्योरेंस रहेगा तो आप निश्चिंत होकर अपने अन्य कामों में व्यस्त रहे सकते हैं । यह खेती सीसीटीवी की निगरानी में होती है और बिना अनुमति एक बड़ा चंदन का टुकड़ा रखने पर भी आपको कई वर्षों तक जेल की हवा खिला सकता है। ऐसे में इसकी चोरी के असफल प्रयास ढेर हो जाते हैं।

कैसे किया कीड़ाजड़ी का उत्पादन
उत्तराखंड के चमोली गढभाल की दिव्या रावत द्वारा 3,500 मीटर की ऊचाई में पैदा होने वाली कीड़ा जड़ी के विकल्प को लैब में तैयार करने का भारत में यह पहला मामला माना जा रहा है। हाल ही में दिव्या ने एक टी रेस्टोरेंट खोला है जहां बेशकीमती औषधि ‘कीड़ाजड़ी’ से बनी चाय परोसी जाती है। इस रेस्टोरेंट में दो कप चाय की कीमत 1,000 रुपये है। लेकिन दिव्या के यहां पहुंचने का सफर दिलचस्प है। कीड़ाजड़ी कॉर्डिसेप्स मिलिटरीज प्राकृतिक रूप से उगने वाली कीड़ाजड़ी (कॉर्डिसेप्स साइनेसिस) का ही एक रूप है, जिसे विदेशों में इसके विकल्प के रूप में लैब में तैयार किया जाता है। दिव्या मूल रूप से चमोली गढ़वाल के कंडारा गांव की रहने वाली हैं। उन्होंने दून क्षेत्र के मोथरोवाला गांव में छोटे से घर में 100 बैग के साथ मशरूम उत्पादन के क्षेत्र में कदम रखने के बाद दिव्या कामयाबी के रोज नए शिखर छू रही हैं।

दिव्या का एक छोटा सा प्रयास आज सौम्या फूड प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में लोगों के सामने है। जिसके माध्यम से दिव्या अपने साथ तमाम उन लोगों की जिंदगी को मुकाम देने की कोशिश में लगी हैं, जो लोग खुद के बूते आगे बढ़ना चाहते हैं। बटन, मिल्की मशरूम और ओएस्टर की कई प्रजातियों के सफल उत्पादन के बाद दिव्या ने कीड़ाजड़ी लैब में उगाने के बारे में सोचा। इसी के तहत दिव्या ने थाईलैंड का दौरा किया और वहां इसकी तकनीक सीखी। थाइलैंड, वियतनाम और चीन में इस स्पीशीज का लैब में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। प्राकृतिक रूप से पाई जानी वाली कीड़ाजड़ी की अनुपलब्धता के कारण इसका महत्व और कारोबार दूसरे देशों लगातार बढ़ रहा है। बकौल दिव्‍या, थाईलैंड से टिश्यू कल्चर लाने के बाद मैंने खुद लैब में इसका लिक्विड स्पॉन तैयार किया। कामयाबी की उम्मीद कम थी, लेकिन मैंने कर दिखाया। इस काम में थाईलैंड की मशरूम ग्रोवर नानिंग पुंगटोन और कैंथो एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, वियतनाम की डॉ. ज्यून ने ट्रेनिंग लेने से लेकर अब तक लगातार उनका मार्गदर्शन किया।

हाल ही में दिव्या ने एक टी रेस्टोरेंट खोला है जहां बेशकीमती औषधि ‘कीड़ाजड़ी’ से बनी चाय परोसी जाती है। इस रेस्टोरेंट में दो कप चाय की कीमत 1,000 रुपये है। लेकिन दिव्या के यहां पहुंचने का सफर दिलचस्प है।

उत्तराखंड राज्य जब उत्तर प्रदेश से अलग हुआ तो यहां आधारभूत ढांचा न होने की वजह से लोगों को रोजगार के लिए इधर उधर भटकना पड़ा। बीते कई सालों से रोजगार की तलाश में पहाड़ के कई गांव खाली हो गए। युवा भी पढ़ लिखकर दूसरे शहरों में नौकरी करने लगे। बाकी तमाम युवाओं की तरह दिव्या ने भी दिल्ली आकर सोशल वर्क की पढ़ाई की। पढ़ाई खत्म होने के बाद उन्होंने ‘शक्तिवाहिनी’ नाम के एक एनजीओ में नौकरी भी की। लेकिन उनके मन में हमेशा से पहाड़ के लोगों के लिए कुछ करने की सोच थी। उन्होंने गांव के लोगों को काफी आभावों में जिंदगी बिताते हुए देखा था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *