अड़बानी तो सिर्फ बहाना है ममता को भाजपा संग आना है

जितेन ठाकुर / नई दिल्ली  –
आडवाणी से ममता बनर्जी का मिलना इशारा कर रहा है कि ममता एन.डी.ए. के साथ आना चाहती है। असम में जिस तरह भाजपा ने सर्वोच्च अदालत के रास्ते, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के जरिये ,40 लाख गैर भारतियों को बहार का रास्ता दिखने की कवायत तेज कर ली है ,उससे ममता बनर्जी के जमीन खिसकना भी शुरू हो गई है। अकेले पश्चिमी बंगाल में ही अवैध रूप से बसे गैर भारतियों की संख्या तीन करोड़ के आसपास बताई जाती है। यह समूह ममता बनर्जी का सबसे बड़ा बोट बैंक है। लेकिन अब तक ममता इन्हे यह आश्वासन देती आई थी कि उन्हें जिस प्रकार उन्हें अधिकार दिया गया है उस प्रकार उन्हें कभी यहां से निकाला नहीं जा सकता। लेकिन अब यह साफ हो चला है कि असम के बाद पश्चिमी बंगाल से भी इन लोगों को निकलना ही होगा। और यहां ममता के लिए आगे कुआं पीछे खाई सी स्थिति हो पैदा हो गई है।

हालांकि इस पूरी प्रक्रिया को अभी कुछ वर्ष लग सकते हैं लेकिन तब तक इन लोगों के अधिकार अवश्य ही छीन लिए जा सकते हैं। ऐसे में ममता आगामी चुनावों को देख कर सजग कम ,घबराई अधिक लग रही हैं। क्यूंकि अगर बंगाल से लगभग तीन करोड़ अवैध गैर भारतियों के अदिकार छीने गए , तो ममता का सिंहासन डोलना तय है। कांग्रेस समर्थित महां गठबंधन में हालाँकि बिकल्प के तौर पर ममता बानी रहना चाहती हैं ,लेकिन यह उन्हें भी भली तरह मालूम है कि इस गठबंधन में नेतृत्व की लड़ाई हावी होने बाली है। एनआरसी का मुद्दा जिस तरह नार्थ ईस्ट में भाजपा के लिए वोट बैंक साबित होगा ,उसी तरह बंगाल में भी भाजपा की पकड़ को मजबूत करेगा।

अवैध रूप से आये इन गैर भारतियों के विरोध में असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता कर 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड को डिक्लेयर किया, लेकिन इसके बाद इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी। आइए आपको बताते हैं कि 1985 में राजीव सरकार द्वारा साइन किए गए असम अकॉर्ड में एनआरसी बनाया गया था । लेकिन आज तक सरकार इसे लागू नहीं कर पाई क्यूंकि इससे एक धर्म विशेष के नाराज होने का खतरा वोट बैंक पर हावी रहा । देश में असम ही एक मात्र राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़ा अलग है। प्रदेश में 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा।

सालों में यह मामला लटकता चला गया, इसके बाद यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत पहुंचा। इसी मामले को लेकर असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। भाजपा इसे पहले से मुद्दा बनाये हुए थी और असम के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इसे सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था, जिसके चलते मूल असमी लोग भाजपा के पक्ष में आ खड़े हुए । 2015 में सर्वोच्च अदालत के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और अब 2018 जुलाई में इसका फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सर्वोच्च अदालत ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है। और लोगों से फिर अपील की गई है कि जिनका नाम किसी गलती, किसी गैरहाजरी या दूसरी किसी गलती के कारण से छूट गया है ,वह अपने बारे में कोई भी जानकारी देकर अपना नाम इस इस रजिस्टर में दर्ज करा सकते हैं ।

ममता बेनर्जी ने समय की नब्ज टटोल कर भाजपा की तरफ नजदीकियां बढ़ाई हैं। अदबनी के रस्ते ही अब भाजपा के साथ खड़े होने के लिए ममता रास्ते तलाशने में लग गई है। क्यूंकि कहीं न कहीं एक डर तो अब ममता को भी सताने लगा है कि इस बंगाल में इस तरह का अभियान ममता के सिंहासन को हिला देगा । यह सबको पता है कि अब इन लोगों को अधिकारों से बंचित कर अलग कालोनियों में जाना ही होगा, यह अलग बात है कि अपने बयानों से सब एक समुदाय को यह दिखाने की कोसिस में हैं कि हम आपके साथ हैं ।

 

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